वो सूनी सूनी सी आँखें,
जो अब देखती है कम,
उनके भीतर से झलकता,
दुःख का वो गहरा समंदर,
कितने तूफ़ान झेल झेल,
अब शायद हो गया शांत,
बाट जोहती रहती हर-पल,
उस मेहमान का जो शायद,
मुड़कर वापिस भी ना आये,
जो कल तक रहा था अपना,
जो अपने ही खून से सींचा,
अपने ही शरीर से था जना,
आज नए नए रिश्ते जोड़,
गया पुराने रिश्तों को तोड़,
कोई है जो बैठी है इतने पास,
शायद उन आखों में बसी आस,
झूठी है वो आस, एक छलावा,
पर कमबख्त साथ नहीं छोडती,
रोज़ सुबह सूरज उगने के साथ,
आ बैठती वहीँ उन आखों में,
साथ ले आती अपने वो अक्सर,
पुरानी यादों को समेट कर ऐसे,
जैसे ही सूरज ढलने को होता,
वो भी गुम होने लगती वैसे वैसे,
घुल जाती फिर वो स्याह रात में,
पर वो बीती यादें वहीँ अड़ी रहती ,
धकेलती रहती आंसुओं को नीचे,
उन सूख चुकी आँखों के कोनों से,
धीरे धीरे गालों की खुदरी सतह पर,
कल जिसकी ऊँगली थामकर, वो ,
रास्ते पर बड़े फख्र से था चलता,
आज वो उँगलियाँ इतनी है बड़ी,
जो छप गयी उसके बूढ़े चेहरे पर,
नाउम्मीदी तो है उसे अब हमेशा,
अपनी औलाद से,पर मोह है बाकी,
तभी तो वो बूढी आँखें तकती है रोज़,
उस नाशुक्र औलाद की राह, बेरोक .................
==मन वकील
जो अब देखती है कम,
उनके भीतर से झलकता,
दुःख का वो गहरा समंदर,
कितने तूफ़ान झेल झेल,
अब शायद हो गया शांत,
बाट जोहती रहती हर-पल,
उस मेहमान का जो शायद,
मुड़कर वापिस भी ना आये,
जो कल तक रहा था अपना,
जो अपने ही खून से सींचा,
अपने ही शरीर से था जना,
आज नए नए रिश्ते जोड़,
गया पुराने रिश्तों को तोड़,
कोई है जो बैठी है इतने पास,
शायद उन आखों में बसी आस,
झूठी है वो आस, एक छलावा,
पर कमबख्त साथ नहीं छोडती,
रोज़ सुबह सूरज उगने के साथ,
आ बैठती वहीँ उन आखों में,
साथ ले आती अपने वो अक्सर,
पुरानी यादों को समेट कर ऐसे,
जैसे ही सूरज ढलने को होता,
वो भी गुम होने लगती वैसे वैसे,
घुल जाती फिर वो स्याह रात में,
पर वो बीती यादें वहीँ अड़ी रहती ,
धकेलती रहती आंसुओं को नीचे,
उन सूख चुकी आँखों के कोनों से,
धीरे धीरे गालों की खुदरी सतह पर,
कल जिसकी ऊँगली थामकर, वो ,
रास्ते पर बड़े फख्र से था चलता,
आज वो उँगलियाँ इतनी है बड़ी,
जो छप गयी उसके बूढ़े चेहरे पर,
नाउम्मीदी तो है उसे अब हमेशा,
अपनी औलाद से,पर मोह है बाकी,
तभी तो वो बूढी आँखें तकती है रोज़,
उस नाशुक्र औलाद की राह, बेरोक .................
==मन वकील
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