जब वो छोटा सा था,शायद छोटा सा,
तब वो आकर मेरे कंधे पर चढ़ जाता,
जिद करने लगता कंधे पर लधे लधे,
भैया,खड़े हो जाओ,मुझे चाँद है देखना,
तब मैं उस बाल-सुलभ जिद के लिए,
उचककर खड़ा हो जाता उसे थाम कर,
और वो यूहीं मेरे कंधे पर बैठे हुए,ऐसे,
मेरे सिर को अपने हाथों से हुए कसे,
खिलखिलाकर वो चाँद देखा करता,
आज जब वो बड़ा हो गया है, मुझसे,
अब भी वो अक्सर चाँद देखने के लिए,
चढ़ जाता है यूहीं मेरे कंधो पर ऐसे,
बिना मुझसे कुछ कहे,बिन मुझसे पूछे,
कसकर जकड़ लेता वो मेरा सिर जैसे,
और अब खिलवाड़ भरी हंसी हँसता वो,
शायद मुझे रोंद, अब वो चाँद देखना,
उसकी फितरत में होने लगा है शुमार,
तभी मुझसे मेरी उंचाई छीन कर,वो,
खून के रिश्तों को निभा रहा, बस ऐसे,
और मैं बेजुबान सा कभी यूहीं बैठता,
या फिर उसके के कहने पर खड़ा होता,
भाई है वो मेरा,जिसे चाँद देखना है,
आज भी मेरे कन्धों पर चढ़ कर ऐसे....
==मन वकील
तब वो आकर मेरे कंधे पर चढ़ जाता,
जिद करने लगता कंधे पर लधे लधे,
भैया,खड़े हो जाओ,मुझे चाँद है देखना,
तब मैं उस बाल-सुलभ जिद के लिए,
उचककर खड़ा हो जाता उसे थाम कर,
और वो यूहीं मेरे कंधे पर बैठे हुए,ऐसे,
मेरे सिर को अपने हाथों से हुए कसे,
खिलखिलाकर वो चाँद देखा करता,
आज जब वो बड़ा हो गया है, मुझसे,
अब भी वो अक्सर चाँद देखने के लिए,
चढ़ जाता है यूहीं मेरे कंधो पर ऐसे,
बिना मुझसे कुछ कहे,बिन मुझसे पूछे,
कसकर जकड़ लेता वो मेरा सिर जैसे,
और अब खिलवाड़ भरी हंसी हँसता वो,
शायद मुझे रोंद, अब वो चाँद देखना,
उसकी फितरत में होने लगा है शुमार,
तभी मुझसे मेरी उंचाई छीन कर,वो,
खून के रिश्तों को निभा रहा, बस ऐसे,
और मैं बेजुबान सा कभी यूहीं बैठता,
या फिर उसके के कहने पर खड़ा होता,
भाई है वो मेरा,जिसे चाँद देखना है,
आज भी मेरे कन्धों पर चढ़ कर ऐसे....
==मन वकील
No comments:
Post a Comment