Monday, 25 June 2012

रास्ते ही रास्ते, हर ओर है बस रास्ते,
मन की घाटियों में गोल घूमते रास्ते,
कभी सरल है, तो कभी कठिन रास्ते,
दुविधा से भरे,या उससे परे वो रास्ते,
कहीं अन्तःहीन है, कहीं सिमटे रास्ते,
वासना से भरे,या बोध से सुलझे रास्ते,
कुंठा के मील पत्थर से गुथे हुए रास्ते,
कभी मुस्कराहटों से बीत जाते रास्ते,
अंधियारों से घिरे या चमकते से रास्ते,
कभी मुझमे समाये, या निकलते रास्ते,
जब मैं हुआ सरल,मन बन गया रास्ते,
जो हुआ कठिन, तो ढूंढ़ता रहा मैं रास्ते,
समय की पहाड़ियों से नीचे आते रास्ते,
यादों की वादियों में कहीं खो जाते रास्ते,
अनजान सायों के साथ गुज़र जाते रास्ते,
कभी अपनों के बीच ठोकर दे जाते रास्ते,
भूत से वर्तमान की खाइयों में खोते रास्तें,
कभी भविष्य की झूठी आस में रोते रास्ते,
कभी हिम्मत के तारकोल से बने वो रास्ते,
कहीं कमज़ोर मनसा तंतु से बने वो रास्ते ,
कहीं ईश्वर की मूर्त को संग पूजते है रास्तें,
कभी नास्तिक हो अस्तित्व को पूछते रास्ते,
कभी अन्तर्वासना से पीड़ित हो उठते रास्तें,
कभी आनंदित हो व्यसनों से जी उठते रास्ते,
मन-वकील क्या कहे, क्या जीवन को रास्ते ?
सब करों अपनी मन की, मैं चला अब अपने रास्ते,,,,,,,
=मन वकील


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