समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
कांच के सपने थे या फिर कोई हवा,
कुछ यूँ टूटे मिले, कुछ उड़ गये कैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
खामोशियों की गर सुनता मैं आवाज़,
हाथ में ले पत्थर तोड़ता उनको वैसे,
क्यूँकर आकर बसते मेरी पलकों में,
जब ना थे वो नमकीन आँसुओं जैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
कुछ तितली बन आये थे मेरे चमन,
कुछ करते रैनबसेरा,परिंदों के जैसे,
घूम घूम देते पल पल कई खुशियाँ,
कहाँ खो गये,ढूंढता हूँ पागलों जैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
====मन वकील
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
कांच के सपने थे या फिर कोई हवा,
कुछ यूँ टूटे मिले, कुछ उड़ गये कैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
खामोशियों की गर सुनता मैं आवाज़,
हाथ में ले पत्थर तोड़ता उनको वैसे,
क्यूँकर आकर बसते मेरी पलकों में,
जब ना थे वो नमकीन आँसुओं जैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
कुछ तितली बन आये थे मेरे चमन,
कुछ करते रैनबसेरा,परिंदों के जैसे,
घूम घूम देते पल पल कई खुशियाँ,
कहाँ खो गये,ढूंढता हूँ पागलों जैसे,
समेटने में बीत जाते है अब अक्सर,
दिन मेरे, कुछ टूटी यादों को यूँ ऐसे,
मन के आंगन में बिखरे हुए पड़े जो,
यहाँ वहाँ,चुभते मुझको नश्तर जैसे,
====मन वकील
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