Wednesday, 22 August 2012

वो मास्टर जी की खरखरी आवाज का ही जोर,
कानों में गूंजा करता  था बस समंदर का वो शोर,
कहाँ मन था और कहाँ याद ज्योमिती के इशारे,
बैठते थे जब हम क्लास में खिड़की के किनारे,
खुले आसमान में देख वो उड़ते परिंदों की फौज,
बस यूहीं सोचा करते थे,इन जैसे करते हम मौज,
कहाँ भटके,जब बाँधे थी डेस्क की वो छोटी शहतीरे
कापियों के पन्नों पर बना चंद आड़ी तिरछी लकीरे,
चलता था मन में तब किट्टू से मिलने का ही जोर,
तभी रह गये हम पीछे, बन पढ़ाई में ऐसे कमज़ोर,
वो मास्टर जी की खरखरी आवाज का ही जोर,
कानों में गूंजा करता था बस समंदर का वो शोर,
==मन वकील

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