कोने में गठरी की तरह,
पड़ी पड़ी वो काबलियत,
सिसक सिसक कर रोती,
आंसुओं से अधिक है अब,
चीखों का मौन होता शोर,
जो दबकर होने को हैं अब,
कमज़ोर और बेअसर ऐसे,
देख रही है अँधेरा कालिख,
गुमनामियत जो छप गयी,
क़ाबलियत के चेहरे पर जैसे,
और दूर वहां इक कुर्सी है,
जहाँ अब काबिज़ हो गयी,
सिफारिश,इल्म से हटी हुई,
पर किसी ख़त से की गयी,
किसी नेता या मंत्री के हाथों,
उसके लैटरहेड पर तारीफ़ बन,
जहाँ एक और है छापा हुआ,
सत्यमेव जयते, अशोक लाट,
सचमुच आज के दौर का सच,
यही है, सिफारिश एव जयते,
तभी तो सिफारिश ठहाके मर,
मुहँ चिढाती हुई नज़र आती,
यहाँ वहां,हर सरकारी दौर में,
जहाँ क़ाबलियत का वज़न अब,
दिन पर दिन घटता ही जाता,
और सिफारिश वजनी बन कर,
हर कुर्सी पर बैठ किस्मत बनाती,
और गांधीजी अब चुपचाप ऐसे,
झांकते रहते मुस्कराते हुए जैसे,
अपने फोटोफ्रेम में बस टंगे टंगे,
सत्यमेव जयते सत्यमेव जयते,
क़ाबलियत जाए गड्डे में धडाम,
सिफारिश रहे चहु ओर वासयते..........
=मन वकील
पड़ी पड़ी वो काबलियत,
सिसक सिसक कर रोती,
आंसुओं से अधिक है अब,
चीखों का मौन होता शोर,
जो दबकर होने को हैं अब,
कमज़ोर और बेअसर ऐसे,
देख रही है अँधेरा कालिख,
गुमनामियत जो छप गयी,
क़ाबलियत के चेहरे पर जैसे,
और दूर वहां इक कुर्सी है,
जहाँ अब काबिज़ हो गयी,
सिफारिश,इल्म से हटी हुई,
पर किसी ख़त से की गयी,
किसी नेता या मंत्री के हाथों,
उसके लैटरहेड पर तारीफ़ बन,
जहाँ एक और है छापा हुआ,
सत्यमेव जयते, अशोक लाट,
सचमुच आज के दौर का सच,
यही है, सिफारिश एव जयते,
तभी तो सिफारिश ठहाके मर,
मुहँ चिढाती हुई नज़र आती,
यहाँ वहां,हर सरकारी दौर में,
जहाँ क़ाबलियत का वज़न अब,
दिन पर दिन घटता ही जाता,
और सिफारिश वजनी बन कर,
हर कुर्सी पर बैठ किस्मत बनाती,
और गांधीजी अब चुपचाप ऐसे,
झांकते रहते मुस्कराते हुए जैसे,
अपने फोटोफ्रेम में बस टंगे टंगे,
सत्यमेव जयते सत्यमेव जयते,
क़ाबलियत जाए गड्डे में धडाम,
सिफारिश रहे चहु ओर वासयते..........
=मन वकील
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