Friday, 14 December 2012

                                         नितान्त अकेला

      जब भी मिलता था वो,सब लोगो से,  
      खुलकर मिलता वो इक आकाश सा,
      बांहें फैली हो या ना हो कभी उसकी,
      परन्तु दिल के भीतर भाव खुले होते,
      उसके चेहरे की चमकती मुस्कराहट ,
      सब ब्यान कर देती उसकी वो सादगी,
      बातों में कोई लाग-लबेड नहीं होता, 
     और जो होती थी तो मिलने की ख़ुशी,
      आँखों के कोनों में छुपी वो नमी सी,
     कभी सरक कर गालों पर आ जाती,
     गलें से निकलते कभी रुन्धें बोल भी,
     वो जुदा सा था सबसे अलग इंसान,
     हर किसी से वो मीठा बोलना उसका,
    शायद अक्सर लोगों को था अखरता,
    लोग कुटिल से मुस्कान होंठों पर रखें,
    कुरेदते रहते उसके चेहरे की परतों को, 
    शायद कहीं उन्हें उनके मन की मिले,
    शायद कोई अँधेरा निकल आये बाहर,
    जब हार जाते तो लगते वो झुंझलाने,
    फिर जुबान बदलकर खीज बन जाती,
    धीरे धीरे सभी बदलने लगे खीजकर, 
    अपनी हार को ओझल करने को उद्धत,
   और वो अकेला ही रह गया उस राह में,
   नितान्त अकेला, बस चेहरों को तलाशता ....

====मन वकील 
  
  

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