अब यह शहर कहाँ रहा, अब बसते यहाँ हैवान,
चेहरे रखे है आदम जात,भीतर बसे इनके शैतान,
औरत को औरत ना समझे, समझे एक खिलौना
मन भरी पीप इनके,दरिंदगी बनी इनका बिछौना,
जुल्म से बढ़ कर जुल्म, हैवानियत भी इनसे काँपे,
नजरों से झांके वासना,चाहे कितने ही कोई तन ढाँपे,
उनकी घिनौनी हरकतों से, काली ताकतें भी है हैरान,
अब यह शहर कहाँ रहा, अब बसते यहाँ हैवान,
ये नहीं छुपते कहीं,सड़कों पर अब खुलेआम निकलते,
अंधियारों की क्या बात,दिन के उजालों में अब ये पलते,
भैया, बाप , मित्र या पति,किसी के भी संग हो कोई नार,
झट से कुत्ते सी जुबान निकाल,बस अचानक करते ये वार,
आदम जात की खाल ओढें,ये भेडियें बने फिरे पहलवान,
अब यह शहर कहाँ रहा, अब बसते यहाँ हैवान,
यहाँ ना कोई माँ बेटी बहन की अस्मत का पहरेदार,
पीसीआर में सोयी है पुलिस,संसद में सोती सरकार,
इज्ज़त लुटने के बाद होहल्ला करे नेताओं का दरबार,
सज़ा कहाँ मिले जुल्मी को,इंसाफ भी सड़ हुआ बेकार,
कैसी जाए मेरी बेटी स्कूल सुरक्षित, मैं हूँ अब परेशान
अब यह शहर कहाँ रहा, अब बसते यहाँ हैवान,
=============मन वकील
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