अब तकरीरों से पहले ही यूँ फैसले होते,
लकीरों के आगे बढ़े हुए यूँ फासलें होते,
कमबख्त रंजिशें है अब मेरे पास बची हुई,
मोहब्बत के सब फूल आंधियां ही ले गयी,
वो पत्ते जो लिखे थे कभी तेरे नाम पर मैंने,
टूट कर गये जमीं पे,वो अब यूँ मसले होते,
अब तकरीरों से पहले ही यूँ फैसले होते,
लकीरों के आगे बढ़े हुए यूँ फासलें होते,
मजबूर था मन-वकील जो, सीने में थी मजबूरियां,
वो साथ साथ चलते थे, पर दिलों में थी यूँ दूरियाँ,
कुछ बात थी मगर, वो बेबाकी ना थी अब बाकी,
बस सोचता रहा मैं, काश मुझमे कुछ होंसले होते,
अब तकरीरों से पहले ही यूँ फैसले होते,
लकीरों के आगे बढ़े हुए यूँ फासलें होते,
==मन वकील
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