उसने कही उसकी चुगली,
उसने सुनी, उसने ही मानी,
उसकी बात उसको ही भावे,
फिर क्यों रही वो अनजानी,
पल में पिघली जो रही सर्द,
रिस रिस बहे उसकी कहानी,
कुछ पकी सी लगी,कच्ची भी,
उसने ही भोगी खुद वो जवानी,
कुछ कुरेदा उसने, कुछ दबाया,
उन यादों की वो बची निशानी,
आँखों में थी कभी नींद बन बन,
कभी उड़ उड़ गयी बन जागरानी,
किनारों से कुछ उसने भी समेटी,
फिर भी खुल नज़र आई नादानी,
चुपचाप रहा मन वकील सब देखे,
कैसी तमाशा बनी ये जिंदगानी।।
==मन वकील
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