एहे कड्वो सच से इह झूठी आस भली
जो दीयों सबहु रंग सो मन को बहलाय,
कैसो मोल ना करे, इहु मृग तृष्णा को,
मन-वकील,जो मृग दीयों चहुओर भटकाय
=======मन-वकील
जो दीयों सबहु रंग सो मन को बहलाय,
कैसो मोल ना करे, इहु मृग तृष्णा को,
मन-वकील,जो मृग दीयों चहुओर भटकाय
=======मन-वकील
No comments:
Post a Comment