Thursday, 16 June 2011

सच नहीं बोलेगा

सच, जो नित मुझे डरा देता है,
कैसे बोल पाऊंगा में , इसे कभी,
यदि बोल दूंगा तो, निश्चित ही,
कुछ बंधू होंगे विमुख मुझसे,
और कुछ मित्र विचलित से,
कोई तो अधिकता की सीमा ,
लांगकर, उगल देगा एकाएक,
मेरे बारे में , अपना वो सच ,
जो उसने भी छुपाया होगा,
भीतर मन के अँधेरे कोने में,
बिलकुल मेरी तरह, जैसे में,
मन के उस अँधेरे कोने में रोज़,
झांकता तो हूँ, पर उसके कपाट,
बंद रखता भय से, कही कोई,
खोल ना दे मेरे भीतर की परते,
शायद तभी यह सच पड़ा रहता ,
वहां खामोश, चिंतन से युक्त हो,
कभी कभी निकल भी पड़ता ,
मेरे नेत्रों से अश्रु धारा के संग,
परन्तु फिर में यही कोशिश,
करता रहता, चेतन मन से,
कमबख्त छुपा ही रहे, यह,
सदैव, काहे को बाहर आकर,
मित्रों से शत्रुता, रिश्तों में कटुता,
सभी अपने कहे जाने वालों से,
बैर मोल ले, जीवन को दूभर,
बनाने में कोई कसर न छोड़े,
अतः मैं इसे छुपाये रखता,
सदैव झूठ के कई मन बोझ से,
मुझे नहीं कहलाना, वीर महान,
इसके जिव्या पर आते ही, तो,
मैं समाज से बहिष्कृत होकर,
वीरगति को ही ना प्राप्त हो जाऊं,
समझौता कर लिया है मैंने, अब,
अपने उस मरे हुए आत्मबोध से,
जो कुछ भी हो जाए, मैं सदैव,
ढांपे रखूँगा, अपनी हकीकत को,
और मन-वकील सच नहीं बोलेगा ,
कभी भी और कहीं भी,किसी को नहीं......

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