कहो मैं था या तुम थी स्वछंद ?
जो विचारों से उन्मुक्त हो बहती,
जिसे बंधन का कोई आभास नहीं,
यौन या मन का कोई भी, और कभी
कोई बंधन नहीं बाँध पाया तुम्हे, कभी,
अरे, हो तुम बहती हुई एक नदी सी,
जब मैं आया था जीवन में तुम्हारे,
बनकर उस बहती नदी के दो किनारे,
कुछ देर रही तक तुम उनमे सिमटी,
बहती मंद मंद सी, रही मुझसे लिपटी,
फिर भावों में आये अचानक तुम्हारे,
कुछ ऐसे तीव्रता के अनोखे से बहु तंत,
और तुम लांग गयी उन्ही किनारों को,
नदी सी नयी भूमि ग्रहण करने, बिना अंत,
मैं भी संग बह गया था,टूटते किनारों सा,
परन्तु रोक न पाया मैं, तुम्हारी वो गति
कैसा रोक पाता, वो तुम्हारी यौन उन्मुक्तता,
वो स्वतंत्र होने को उद्धत सी,व्याकुल मति,
तुमने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा मुझे कभी,
मैं कहाँ से टुटा कहाँ बहा, सुध न ली कभी
रहा नियमों से परे, खुले व्योम सा आचार,
मैं चाहकर भी न कर सका, कभी प्रतिकार,
और अब जब वापिस आयी तुम बहने फिर,
उसी पथ उसी राह से, जैसे होकर पुनः सिधिर,
अब पूछती हो मुझसे, करती क्यों हो द्वन्द,
कहो प्रिये मैं था या तुम थी स्वछंद ?
जो विचारों से उन्मुक्त हो बहती,
जिसे बंधन का कोई आभास नहीं,
यौन या मन का कोई भी, और कभी
कोई बंधन नहीं बाँध पाया तुम्हे, कभी,
अरे, हो तुम बहती हुई एक नदी सी,
जब मैं आया था जीवन में तुम्हारे,
बनकर उस बहती नदी के दो किनारे,
कुछ देर रही तक तुम उनमे सिमटी,
बहती मंद मंद सी, रही मुझसे लिपटी,
फिर भावों में आये अचानक तुम्हारे,
कुछ ऐसे तीव्रता के अनोखे से बहु तंत,
और तुम लांग गयी उन्ही किनारों को,
नदी सी नयी भूमि ग्रहण करने, बिना अंत,
मैं भी संग बह गया था,टूटते किनारों सा,
परन्तु रोक न पाया मैं, तुम्हारी वो गति
कैसा रोक पाता, वो तुम्हारी यौन उन्मुक्तता,
वो स्वतंत्र होने को उद्धत सी,व्याकुल मति,
तुमने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा मुझे कभी,
मैं कहाँ से टुटा कहाँ बहा, सुध न ली कभी
रहा नियमों से परे, खुले व्योम सा आचार,
मैं चाहकर भी न कर सका, कभी प्रतिकार,
और अब जब वापिस आयी तुम बहने फिर,
उसी पथ उसी राह से, जैसे होकर पुनः सिधिर,
अब पूछती हो मुझसे, करती क्यों हो द्वन्द,
कहो प्रिये मैं था या तुम थी स्वछंद ?
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