अरे, इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
कल तक था जो खुद्दार ऐसा,
वो जी-ह्ज़ुरों की तरह अकड़ गया,
जिस शख्स ने सीखा था कभी,
अपने दम से आसमाँ को हिलाना,
जो जिया पहेरेदार बन, खुद का,
ना हुआ था जिसका जमीर बेगाना,
वो शख्स ना जाने कैसे, अचानक,
रातोरात अपनी तरबीयत से मुकर गया,
अरे,इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
कभी रखता था जो कभी ऐसे,
अपने असूलों को जेवर सा सम्भाल,
वो खाता थे बेशक हर जगह ठोकरे,
पर था वो किसी रसूली माँ का लाल,
वो बेचकर वो सभी पुराने असूल,
अपने आप एक नए गहने में जड़ गया,
अरे, इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
इंकलाबी नहीं था पर ना था कम,
वो किसी जलते हुए इन्कलाब से,
जज्बों में भरे था वो आग इल्म की,
तर्कों का दरिया बहे जैसे किसी किताब से,
वो फाड़ कर उन तकरीरों के पन्ने,
नोटों की महक में वो कैसे जकड गया,
अरे, इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
==मन वकील
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
कल तक था जो खुद्दार ऐसा,
वो जी-ह्ज़ुरों की तरह अकड़ गया,
जिस शख्स ने सीखा था कभी,
अपने दम से आसमाँ को हिलाना,
जो जिया पहेरेदार बन, खुद का,
ना हुआ था जिसका जमीर बेगाना,
वो शख्स ना जाने कैसे, अचानक,
रातोरात अपनी तरबीयत से मुकर गया,
अरे,इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
कभी रखता था जो कभी ऐसे,
अपने असूलों को जेवर सा सम्भाल,
वो खाता थे बेशक हर जगह ठोकरे,
पर था वो किसी रसूली माँ का लाल,
वो बेचकर वो सभी पुराने असूल,
अपने आप एक नए गहने में जड़ गया,
अरे, इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
इंकलाबी नहीं था पर ना था कम,
वो किसी जलते हुए इन्कलाब से,
जज्बों में भरे था वो आग इल्म की,
तर्कों का दरिया बहे जैसे किसी किताब से,
वो फाड़ कर उन तकरीरों के पन्ने,
नोटों की महक में वो कैसे जकड गया,
अरे, इन गुलामों के इस शहर में,
आज फिर इक गुलाम बढ़ गया,
==मन वकील
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